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1. बालक आंखें बार-बार रगड़ता हो, पलकों के बाल नोचता हो, भौंहें मलता हो । 2. आंखें लाल या गंदी रहती हो । 3. आंखें कीचड या पानी देती हो । 4. छोटी वस्तुएँ बड़े ध्यान से देखता हो । 5. पुस्तक को आखों के निकट लाकर पड़ता हो । 6. एक वस्तु के दो प्रतिबिम्ब दिखाई देते हो ।
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7. साधारण प्रकाश से चकाचौंध हो जाता हो । 8. रंगों की पहचान पर ही सिरदर्द हो जाता है । 9. थोड़ा पढ़ने पर ही सिरदर्द हो जाता है । 10. धुंधला दिखाई देना, जल्दी-जल्दी पलक झपकाना, चेहरों को बार-बार हाथों से रगड़ना
आदि ।
उपयुक्त लक्षणों के आधार पर निर्देशन कार्यकर्ता को दृष्टिगत दोषों से युक्त बालकों का पता लगाना चाहिए | तदोपरान्त दृष्टिगत दोषों की मात्रा को ज्ञात करने की आवश्यकता पड़ती है । दृष्टिगत दोष या तो साधारण होते है या गम्भीर हो सकते है । इन दोनों ही प्रकार के लिए पृथक-पृथक निर्देशन कार्यक्रमों की व्यवस्था करनी पड़ेगी ।
गम्भीर दृष्टिदोषों से ग्रसित बालकों को निर्देशन प्रदान करने हेतु विद्यालय के सामान्य संचालक में ही नियमित रूप से दृष्टि संरक्षण कक्षाओं की व्यवस्था की जाय । इन कक्षाओं में नेत्र चिकित्सक समय-समय पर आकर दृष्टि दोषों की जाँच करता रहेगा ।
साधारण दृष्टि दोषों से ग्रसित बालकों को साधारण कक्षाओं में ही दृष्टि सुधार हेतु निर्देशन प्रदान किया जा सकता है । नियमित चिकित्सा के साथ ही साथ इनको विद्यालय की साधारण गतिविधियों में भाग लेने के अवसर प्रदान करने चाहिए । (ख) श्रवण दोषों से ग्रसित बालक
श्रव्य दोषों से ग्रसित बालकों को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है- निपट बहरे तथा ऊँचा सुनने वाले । निपट बहरे वे होते है जो कुछ भी नहीं सुन पाते है । निपट बहरे भी पुन: दो प्रकार के होते है- एक तो वे जो जन्म से ही बहरे होते है तथा दूसरे वे जो बाद में किसी कर्ण रोग अथवा कर्णाधात के कारण श्रवण शक्ति जो बैठते है । (ग) वाणी दोष से ग्रसित बालक
बालक के उच्चारण से सम्बन्धित दोष वाणी दोष कहलाते है । उच्चारण सम्बन्धी दोष इतने अधिक होते है कि यह कहना बड़ा कठिन सा प्रतीत होता है कि कौनसा दोष वाणी में हम हकलाना, तुतलाना, फटा तालू विदेशी, स्वराधात, अटपटी वाणी तथा अनियंत्रित वाणी आदि को सम्मिलित करते है । इनमें कुछ दोष इन्द्रीयजनित होते है, कुछ कार्यगत तथा कुछ संवेगात्मक कारणों से होते है ।
वाणी दोषों से ग्रसित बालकों का निर्देशन करने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता पड़ती है । जब इन्हें यह ज्ञात हो जाता है कि वे वाणी में असामान्य है तो वे संवेगात्मक आघात के शिकार होते है । सामान्य बालकों से पृथक रहते है और यदि साथी उसकी नकल करते है या व्यंग्य करते है तो वह और भी अधिक एकाकी हो जाता है और वाणी दोष को और भी कम कर देता है । अध्यापक को इन बालकों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने की आवश्यकता होती
(घ) गामक दोषों से ग्रसित बालक
गामक दोषों से ग्रसित बालक वे है जिनका कोई शारीरिक अंग किन्हीं कारणों से असामान्य है । शारीरिक अंगों की असामान्यता जन्मजात हो सकती है अथवा किसी रोग या दुर्घटना का परिणाम हो सकती है ।
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अध्यापक का कर्तव्य है कि इन बालकों में आत्मग्लानि तथा आत्महीनता ही भावना का विकास न होने दे और उनमें एक स्वस्थ ‘स्व’ का विकास करे । 16.5.3 शारीरिक दुर्बलताओं से ग्रसित बालक
कुछ बालक शारीरिक रूप में इतने दुर्बल होते है कि वे सामान्य खेल भी नहीं खेल सकते । इस प्रकार के बच्चों को भी उसी प्रकार निर्देशन देने की आवश्यकता पड़ती है । जिस प्रकार अध्यापक शारीरिक पगुंता वाले छात्रों को देता है ।
बालकों में शारीरिक दुर्बलताएँ अनेक कारणों से आ सकती है । कुपोषण, लम्बी बीमारी, क्षय, हृदय रोग या शारीरिक संरचना आदि के कारण शारीरिक दुर्बलताएँ आ जाती है । अध्यापक ऐसे बालकों को संतुलित व्यक्तित्व के विकास हेतु ऐसे अवसर प्रदान कर सकता है । जिससे बालक पाठ्यक्रम तथा सह-पाठ्यक्रम सम्बन्धी क्रियाओं में अपनी शारीरिक सीमाओं को ध्यान में रखते हुए यथासम्भव भाग ले सके ।। 16.5.4 मानसिक रूप से असामान्य बालक
मानसिक रूप से असामान्य बालक वे है जो सामान्य बौद्धिक तथा मानसिक कार्यों से पर्याप्त मात्रा में दूर रहते है । विले ने ऐसे बालक के सम्बन्ध में लिखा है कि ये बालक सीखने की क्षमता में सामान्य बालकों से काफी पृथक होते है । मानसिक रूप से असामान्य बालक मानसिक कार्यों को सामान्य बालकों की तुलना में या तो बहुत ही शीघ्रता तथा कुशलता के साथ कर सकते है । सामान्य बालकों से ज्यादा अच्छी कुशलता से मानसिक कार्य करने वाले बालक प्रतिभावान कहलाते है तथा सामान्य बालकों की अपेक्षा कम काम करने वाले छात्र मन्द बुद्धि बालक कहलाते है । 16.5.5 प्रतिभा सम्पन्न बालक (Gifted Children)
प्रतिभा सम्पन्न बालक समाज और राष्ट्र की सम्पति होते है । ये भविष्य में समाज एवं राष्ट्र के कल्याणकारी सदस्य के रूप में सामने आते है । अत: अध्यापक तथा निर्देशन कार्यकर्ताओं का कर्तव्य है कि वे इन बालकों की प्रतिभाओं के पूर्ण एवं समुचित विकास हेतु आवश्यक निर्देशन प्रस्तुत करें ।
प्रतिभा सम्पन्न बालकों में सामान्यतया निम्नांकित लक्षण दिखाई देते है1. विद्यालय विषयों के मापन हेतु प्रयुक्त निष्पति परीक्षणों में अच्छे अंक प्राप्त करते है। 2. बालकों में तीव्र निरीक्षण शक्ति, अच्छी स्मरण शक्ति, तत्काल उतर क्षमता, ज्ञान की
स्पष्टता एवं मौलिकता, विचारों को तार्किक विधि से प्रस्तुत करने की शक्ति तथा विशाल एवं मौलिक शब्दावली पाई जाती है । 3. प्रतिभा सम्पन्न बालक व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा शारीरिक स्वच्छता का पूरा- पूरा
ध्यान रखते है। 4. प्रतिभा-सम्पन्न बालक सामाजिक होते है, उनका सामाजिक विकास संतुलित होता है,
सामाजिक कार्यों में प्रसन्नता से सहयोग प्रदान करते है । 5. वे विदयालय में नियमित रूप से अध्ययन के लिये उपस्थित रहते है ।
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कार्यकत्र्ताओं तथा अध्यापकों को प्रतिभा-सम्पन्न बालकों को निर्देशन प्रदान करने में विशेष सावधानी रखने की आवश्यकता होती है । इनके लिये उन्हें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना पड़ता है ।।
1. प्रतिभा सम्पन्न बालकों की समुचित पहचान की जाए तथा उनकी अनेक तथा विविध । क्षमताओं की माप की जाए । 2. उन क्रियाओं को प्रारम्भ किया जाए तो प्रतिभा सम्पन्नों की योग्यताओं, क्षमताओं,

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