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फलस्वरूप सामाजिक चेतना का विकास हुआ है लोगों ने इसे समझा है तथा अनुभव भी किया है कि प्रत्येक व्यक्ति के शिक्षित होने पर ही समाज का कल्याण हो सकता
है । इसी तथ्य के आधार पर प्रौढ़ शिक्षा का अभियान शुरू किया गया । 9. व्यावसायिक शिक्षा : किसी भी व्यक्ति को कुशलता से जीवन यापन करने के लिये
व्यावसायिक दक्षता की आवश्यकता होती है । इस बात को ध्यान में रखते हुए व्यावसायिक शिक्षा की व्याख्या पर भी बल दिया गया है । व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा होकर आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बन सकता है तथा सम्पूर्ण समाज की आर्थिक
स्थिति में भी सुधार कर सकता है ।। 10. व्यावसायिक जीवन की समस्याओं के अध्ययन का प्रशिक्षण : समाजशास्त्र, व्यावहारिक
जीवन की समस्याओं के अध्ययन पर भी बल देता हैं इससे छात्र सामाजिक जीवन की व्यावहारिक जटिलताओं को समझ सकते हैं । इनके समाधान के लिये विद्यालय में
विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिये ।। 11. अध्यापक के कार्य : अध्यापक छात्रों के व्यक्तित्व का आदर करें । उनमें मिलजुल कर
कार्य करने की भावना विकसित करें । छात्रों को सामाजिक विकास के लिये प्रेरित करें

तथा स्वयं भी समाज के प्रति संवेदनशील रहे । अध्यापक सभी छात्रों के साथ समान
व्यवहार करें तथा निष्पक्ष रहें । छात्रों में उत्तम नागरिकता के गुणों का विकास करें । 12. सामाजिक सेवा : विद्यालय में समय-समय पर सामाजिक सेवा कार्यक्रम का आयोजन
किया जाना चाहिये तथा छात्रों को सामाजिक सेवा के कार्य के अवसर प्रदान किये जाने
चाहिये ।। 13. शिक्षा का प्रबन्ध : समाज की शिक्षा का प्रबन्ध करने का कर्तव्य राज्य का है । राज्य
सरकार बजट में शिक्षा पर अधिक व्यय का प्रावधान रखें । 3.7 शिक्षा के समाजशास्त्र का महत्व तथा सीमाएँ
शिक्षा के समाजशास्त्र में शिक्षा तथा समाजशास्त्र के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है, इस अध्ययन के निम्नलिखित नियम हैं1. शिक्षा की अवधारणा के स्पष्टीकरण में सहायक (Helpful in Clarification of
Concept) शिक्षा का समाजशास्त्र शिक्षा प्रक्रिया की व्याख्या इस प्रकार करता है कि शिक्षा दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच की अन्तः क्रिया का परिणाम है । 2. शिक्षा प्रक्रिया में शिक्षक एवं छात्र का स्थान (Place of Teacher and Student
in Education Process): शिक्षा की प्रक्रिया में शिक्षक तथा छात्र का स्थान क्या है? उनकी भूमिका क्या है? इन सबका विश्लेषण शिक्षा के समाजशास्त्र के द्वारा किया जाता है । इसके आधार पर शिक्षक से यह अपेक्षा की जाती है कि छात्रों को उचित शैक्षिक वातावरण प्रदान करें तथा छात्रों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे वास्तविक
जीवन की क्रियाओं में मन से सहभागी बनें । 3. शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित करने में सहायक (Helpful in Determining Aims
of Education): समाज की समस्याओं तथा आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करने में शिक्षा का समाजशास्त्र सहायता प्रदान करता है । यह समाज
की समस्याओं क निराकरण में शिक्षा की भूमिका पर भी प्रकाश डालता है । 4. शिक्षा के पाठ्यक्रम के निर्माण में सहायक (Helpful in Construction of
Curriculum): शिक्षा का समाजशास्त्र पाठ्यक्रम निर्माण के लिये आधार प्रदान करता है । शिक्षा के समाजशास्त्री में सामाजिक क्रियाओं का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जाता है । शिक्षा के पाठ्यक्रम में कौन सी सामाजिक क्रियाओं को समावेशित किया
जाना है । इसका निर्धारण शैक्षिक समाजशास्त्र के द्वारा किया जा सकता है। 5. शिक्षण विधियों के निर्माण में सहायक (Helpful in Construction of Teaching
Method) । 6. शिक्षा में अनुशासन की अवधारणा का स्पष्टीकरण(Helpful in Clarification of
Concepts of Discipline in Education) शिक्षा के समाजशास्त्र की सीमाएं
1. यह केवल सामाजिक पक्ष की व्याख्या करता है । 2. यह मनोविज्ञान के नियमों पर आधारित नहीं है ।।
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3.8 सामाजिक परिवर्तन
समाज परिवर्तनशील है इसमें समय-समय पर परिवर्तन होते रहते है । जब अतीत पर दृष्टि पात करते है तो ज्ञात होता है कि जो जीवन हमारे पूर्वज व्यतीत करते थे वो हम नहीं कर रहे है । समाज में दिन-प्रतिदिन जो परिवर्तन होते है उन्हें हम सामाजिक परिवर्तन कहते है। परिवर्तन की प्रक्रिया सार्वभौमिक है तथा संसार का निश्चित नियम है । कुछ समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन की परिभाषाएँ इस प्रकार दी है ।।
“सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जो सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक प्रतिमानों, सामाजिक अन्त क्रिया या सामाजिक संगठन के किसी अंग से अनार या रूपान्तर को अभिव्यक्त किया जाता हैं।” जोन्स (Jones)
सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा की भूमिका (Role of Education in Social Change): कुछ सामाजिक परिवर्तन शिक्षा की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है कोठारी आयोग ने कहा हैं “यदि बिना किसी हिंसात्मक क्रान्ति के बड़े पैमाने पर परिवर्तन करना है तो केवल एक ही का प्रयोग किये जा सकता है और वह शिक्षा । शिक्षा की सामाजिक परिवर्तन में भूमिका निम्न लिखित बिन्दुओं से समझाई जा सकती हैं1. सामाजिक परिवर्तन के विरोध का अन्त (To overcome Opposition of Social
Change): कुछ सामाजिक शक्तियां सामाजिक परिवर्तन का सदैव विरोध करती रही है। क्योंकि इससे उन्हें अस्तित्व का खतरा रहता है। शिक्षा वह साधन है जो इस प्रकार की भ्रामक शक्तियों का विरोध करके समाज को परिवर्तित परम्पराओं के प्रति जागरूक
करें। 2. शिक्षा के उद्देश्यों का पुनः निर्धारण (Resetting the aims of Education): कोठारी
आयोग ने कहा है कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा के पुनः निर्धारणा किये जाने चाहिये । 3. प्रजातान्त्रिक मूल्यों को मजबूत बनाना (To Consolidate Democratic Values) 3.9 सामाजिक गतिशीलता
समाज के विकास के साधनों में महत्वपूर्ण साधन सामाजिक गतिशीलता है । सामाजिक गतिशीलता है इसकी परिभाषा इस प्रकार है ।।
सामाजिक गतिशीलता का अर्थ है । सामाजिक समूहों तथा स्तर के पुंज में किसी व्यक्ति का एक स्थिति से दूसरी स्थिति में गति करना । -सेरोकिन (Sorokin) 3.10 सारांश
| शिक्षा का समाजशास्त्र समाज-विज्ञान का महत्वपूर्ण भाग है । शिक्षा और ज्ञान देते ही समाज से जुड़ी हुई है तथा समाज में रह कर ही पूर्णता को प्राप्त हो सकती है व्यक्ति समाज पर और दोनों समाज व्यक्ति पर प्रभाव डालता है तथा दोनो की आपसी अन्तः किया होती है । समाजशास्त्र का सर्वप्रथम अध्ययन आगस्त कामटे ने किया था । यह सम्पूर्ण मानव संस्कृति
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एवं मानव सम्बन्धों के अध्ययन में सहायक है । शिक्षा का समाजशास्त्र, व्यक्ति तथा उसके सांस्कृतिक वातावरण में जिसमें दूसरे व्यक्ति सामाजिक और सामूहिक व्यवहार के प्रादर्श प्रदार्श होते है, व्यक्ति की प्रतिक्रिया का अध्ययन करता है । शिक्षा का समाज शास्त्र शिक्षा के लिये उत्तरदायी, उन जन-समूहों तथा संस्थाओं आदि का भी अध्ययन करता है जो शिक्षा की प्रक्रिया को प्रभावित करते है |

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