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वातावरण से दूर किसी शान्त और रमणीक स्थान में स्थित थी । आधुनिक युग में नगरीकरण के प्रभाव के कारण सभी व्यक्तियों में नगरों में निवास करने की प्रवृति सबल हो गई है । ऐसी दशा में आज की शिक्षा संस्थाओं की नगरों की पृथकता सम्भव नहीं है पर फिर भी उनका निर्माण नगरों के कोलाहल और गन्दगी से दूर किसी शान्त, स्वच्छ स्वासथ्यकर और प्राकृतिक वातावरण में किया जा सकता है ।। | अध्ययन के विषय – आधुनिक भारतीय शिक्षा में अनेक विषयों को स्थान दिया गया है, पर संस्कृति एवं मूल्यों से सम्बन्धित विषयों की उपेक्षा किया जा रही है । अत: अध्ययन विषयों में शान्ति मानवता और विश्व भातृत्व की भावना होनी चाहिए वैदिक पाठ्यक्रमों से ऐसे अनेक तत्व ग्रहण किये जा सकते है । जो आधुनिक भारत के
नैतिक, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक उत्कर्ष में अवितीय योग दे सकते है । 5 शिक्षण विधि व शिक्षा सिद्धान्त – शिक्षण विधि में श्रवण, मनन, चिन्तन, स्मरण,
प्रवचन प्रश्नोत्तर, व्याख्यान, वाद-विवाद आदि का प्रयोग किया जाता था । अतः यह शिक्षण विधि आज भी विभिन्न विषयों के पठन-पाठन में प्रयोग किये जाने के योग्य है। और उपयोगी सिद्ध हो सकती है । कुछ सिद्धान्तों की महत्वपूर्ण आवश्यकता है । छोटी
कक्षाएं, व्यस्त दिनचर्या व्यक्तिगत ध्यान और अच्छी आदतों का निर्माण इत्यादि ।। 4.6 कैसे शिक्षक हो?
विकासोन्मुख भारतीय समाज के साधारण स्तर के, अप्रकार्यात्मक प्रकार के शिक्षकों की आवश्यकता नहीं है । आज हमें ऐसे प्रशासक और कुलपति नही चाहिए जो स्वयं को सुरक्षित
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समझ कर कार्यलयों में कैदी बने हुए प्रशासन चलाने में अभ्यस्त हो जो पक्षपात तथा मानव मूल्यों की हत्या नेताओं की चापलूसी में ही अपनी सफलता को अपनी कुशलता का मापदंड मानते हो । कई वर्ष पुराने अपने नोट्स से कक्ष में श्रुतिलेख देने वाले, शोध और नई पुस्तकों व पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने व विचार गोष्ठियों में जाने से कतराने वाले शिक्षकों से उभरते हुए भारतीय समाज का भला नही होगा । आस्थाहीन आदर्शहीन दर्शनमूल्य तथा भावना व लगनहीन शिक्षकों से देश में वांछित प्रकार की जागृति, चेतना और उत्थान नही हो पायेगा ।
स्पष्ट है नये समाज के निर्माण के लिए आस्थावान-प्रबुद्ध योग्य नमनीय, सजग तथा उत्कृष्ट प्रकार के शिक्षक सभी स्तरों पर चाहिए जो हर स्थान पर सीखने का उपयुक्त वातावरण निर्मित कर सके । जो देश की शोषित जनता की समस्याओं को समझते हो तथा उनको सहायता करने के लिए तैयार हो, जिनका जीवनदर्शन समाज की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप हो, तथा जो शिक्षा शोध व नवज्ञान निर्माण की नई विधियों में पारंगत हो क्योकि विकासोन्मुख समाज के विद्यालयों में शिक्षक का स्थान एक मित्र, पथ प्रदर्शक, समाज सुधारक तथा नेता के रूप में होता है, जिससे अपने छात्रों तथा समाज का समुचित रूप से पथ-प्रदर्शन कर सकें । शिक्षक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समाज में उचित परिवर्तन लाकर उसे प्रगति की और अग्रसर करें । इसके लिए उसमें तीन गुणों की अपेक्षा की जाती है । पहला, वह योग्य नागरिक हो तथा लोकतन्त्रीय आदर्शो, मूल्यों एवं सिद्धान्तों में पूर्ण निष्ठा रखता है दूसरा उसमें अपने छात्रों को समझने तथा उनको पथ-प्रदर्शित करने की क्षमता हो, जिससे वह उनको एक योग्य नागरिक बनाने में सफल हो सकें । तीसरा, वह लोकतन्त्रीय आदर्शों के अनुसार प्रशिक्षित किया गया हो ।
वर्तमान में कई सामाजिक बुराईयों समाज में उभर कर आ रही है । इन नई सामाजिक बुराईयों के निदान के लिए अध्यापकों को विशेष भूमिका अदा करनी चाहिए, जैसे :- छात्रों में वैज्ञानिक प्रवृति का विकास करना
धर्मनिरपेक्षता का विकास करना । छात्रों तथा व्यक्ति को स्वतन्त्रता एवं समानता का पाठ पढ़ाना ।
बालकों में सहभागिता की भावना का विकास करना । – छात्रों को जातिवाद तथा सम्प्रदायवाद जैसी संकीर्णताओं से ऊपर उठाकर उनमें ऐसे
नेतृत्व गुणों का विकास करना, जो संचलन के लिए आवश्यक हो
लोकतात्रिक शिक्षण विधियों का प्रयोग करना । – छात्रों में अधिकार एवं कर्तव्यों के प्रति संकीर्ण भावनाओं का विकास करना । – छात्रों में राजनैतिक चेतना की भावना का विकास करना ।
इस प्रकार हम देखते है कि उभरते हुए भारतीय समाज में शिक्षा एवं शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान है। आज हमारा सामान्य जीवन तनावों, संघर्ष तथा हिंसात्मक कार्यों से खोखला हो चुका है । हम अपेक्षाओं के साये में जीवन जी रहे है । शिक्षा के द्वारा हमें इन सब बुराईयों को दूर करना है और यह कार्य तभी हो सकता है जब शिक्षा व्यवहारिक तथा जीवनोपयोगी हो और शिक्षकों को उच्च चरित्र का व्यक्ति होना चाहिए जिससे वह समाज तथा
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छात्रों का सम्मान प्राप्त कर सकें और अपने उदाहरण एवं सिद्धान्तो दवारा उनका नेतृत्व करने में सफल हो सके ।
4.7 कैसी शिक्षा संस्थाएँ हो?
शिक्षा संस्थाएं ऐसी होनी चाहिए जिसमे उत्तम प्रशासन हो, सही प्रकार की शिक्षा का वातावरण हो, योग्य व लगन वाले शिक्षक पढ़ाते हो तथा सभी वर्गों से आने वाले विद्यार्थियों को अपने शैक्षिक, बौद्धिक, नैतिक व सामाजिक विकास का पूर्ण अवसर मिल सके । शिक्षा संस्थाओं में ऊंची फीस न हो तथा शोषण न हो । शिक्षा सभी की पहुँच की हों । सरकार ने कई नवोदय विद्यालय खोले है जिनमें बहुत से निर्धन व ग्रामीण परिवारों के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते है । यह एक उत्तम प्रयास हे । ऐसे विद्यालय बढने चाहिए ताकि अधिक से अधिक विदयार्थियों को लाभ पहुंच सके । विदयालय की परम्परागत अवधारणा में केवल ज्ञान प्रदान करने के एक साधन के रूप में देखते है । यह विचारधारा शिक्षा की प्रक्रिया को नीरस व निर्जीव बनाती है एवं स्कूल के वातावरण को भी कृत्रिम बनाकर वास्तविकता से दूर ले जाती है। । विद्यालय की आधुनिक अवधारणा के अन्तर्गत समाज विद्यालय से कुछ अधिक अपेक्षाएँ करता है | अब विदयालय सूचना तथा ज्ञान प्रदान करने के केन्द्र मात्र नहीं रहे है | आज के विद्यालय का उद्देश्य लोकतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के लिए एक कुशल व सफल नागरिक का निर्माण करना भी है । हमारे अधिकांश महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय में वहीं पुराने ढंग से घिसे-पिटे पाठ्यक्रम पढ़ायें जाते है । पुस्तकालयों तथा प्रयोगशालाओं में साज समान की बहुत कमी है तथा पढ़ाने का ढंग बहुत पुराना है। उनमें मौलिकता, क्रियात्मकता, कुशलता के उच्च स्तर का विकास करने के लिए ऐसी शिक्षा संस्थाओं का कायाकल्प किया जाना चाहिए | नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत न केवल पाठशालाओं अपितु महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के प्रशिक्षण और पुनः स्थापन के लिए स्टॉफ कॉलेज की व्यवस्था की गई है । यह योजना उपयोगी है । आवश्यकता इस बात की है कि उसे योग्य व्यक्ति चलाये और कोई उपयोगी कार्य करें ।

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