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इसका अभिप्राय है कि उन व्यक्तियों के बालकों को उपलब्ध आश्वासित सार्वभौमिक शिक्षा 6- 10 वर्ष आयु के बालकों को उपलब्ध हो सकेगी व तभी ये समाज के अन्य वर्गों के समान स्तर पर आवेगों व वर्तमान विद्यालय शिक्षा से, जो कि मध्यम वर्गीय लोगों के लिये सार्थक हैं, सकारात्मक रूप से समरस हो सकेंगे । इस दिशा में भारतीय संविधान कि धरायें 15(4 ) तथा 46 में इस पिछड़े वर्गों व विशेष कर अनुसूचित जातियों, जनजातियों के हित में ऐसी व्यवस्था का प्रावधान किया गया है उदाहरण के लिये छात्रवृतियां दिया जाना, उच्च शिक्षा हेतु प्रवेश प्राप्ति के लिये संस्थाओं में आरक्षण, नौकरियों में आरक्षित हिस्सेदारी. उपचारात्मक शिक्षा मुक्त यूनिफार्म दिया जाना स्पेशल कोचिंग कक्षाओं को चालू करना, अनुदान में बड़ी रकम स्वास्थ्य रक्षा सुविधायें, भवन तथा अन्य साधनों को उपलब्ध कराना, विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्तियां आदि की व्यवस्था के लिये अधिकाधिक मात्रा में केन्द्र तथा राज्य सरकारों दवारा कदम उठाये जाने होंगे, विशेषकर के आर्थिक साधनों के दिये जाने बाबत, प्राथमिकता, बहु प्रवेश को मान्यता, औपचारिक, विद्यालयी शिक्षा बीच में छोड़ जाने वाले छात्रों के लिये अंशकालीन तथा स्थानीय लोगों का सहयोग प्रात करना, पाठ्यक्रम को अधिक व्यावहारिक । क्रियात्मक व सामाजिक तौर पर उपयोगी उत्पादन कार्य को अपनाकर समाज के लिये प्रसंगोचित बनाना ।
यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाना होगा कि शिक्षा, समाज व्यवस्था में एक उपसामाजिक व्यवस्था है तथा समाज सामान्य विशेषताओं को प्रतिबिम्बित करती है । अतएवं यह निर्विवाद तथ्य है कि शैक्षिक सुधार अपने आप में सामाजिक सुधार नहीं ला सकेंगे जब तक समाज के ढांचे में भी परिवर्तनों का अभिर्भाव नहीं होता है । (नेवर हुइ पडोसी विद्यालय की परिकल्पना, जिसे कोठारी आयोग ने सुझाया है, अंतिम रूप से सभी वर्गों के लोगों को सामान्य रूप से अच्छी शिक्षा दिलाने में सफल हो सकेगा । क्योंकि, इस के प्रभाव में धनिक तथा विशेषकर अधिकार प्राप्त किये हुए वर्ग भी सार्वजनिक शिक्षा की सम्पूर्ण प्रणाली में सक्रिय रूचि
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लेगें । जिसके फलस्वरूप सर्वत्र सुधार सम्पन्न होगे, इस सब का सामाजिक गतिशीलता, विशेष रूप से लाम्बिक पर ठोस व वांछनीय प्रभाव, समय के साथ-साथ अवश्य दृष्टिगोचर होगा व जिसका सर्वस्व प्रत्यक्ष प्रमाण, राष्ट्रीय चतुर्दिक उन्नति के रूप में 21 वीं शताब्दी के प्रथम चरण में प्राप्त हो सकने की संभावना सुनिश्चित है ।। 5.6 मूल्यांकन प्रश्न 1 एक उच्च स्तरीय सामाजिक गत्यात्मकता पाने के लिए किस प्रकार की शिक्षा की
आवश्यकता होती है । 2 उन कम से कम पांच कारकों को अंकित कीजिए जो भारत में शिक्षा को सामाजिक
गत्यात्मकता का महत्वपूर्ण संयंत्र बनने नहीं दे रहे हैं । 3 भारत में प्रदत्त गत्यात्मकता के पक्ष अथवा विपक्ष अपना तर्क प्रस्तुत कीजिये ।। 5.7 संदर्भ ग्रंथ
1 Morris,Ivor,Sociology of Education London 2 Miller,S.S”Comparative Social Mobility Current Socielogy
(Vol.IXNo/1)196pp53-60 3 Index.Alex,”Social Stratication and Mobility in the Sovient
Union:1940-50,American Socilogical Review Vol.XV,August
1950pp.470-475 4 Packard, V.”The Status Seekers Hermonsworth, Penguin Books,
1963. 5 Turner,”Sponspred and Contest Mobility and the Social System”in
Readings in the theory of Educational System., (ed.)Kari Hopper,London,Nuthhimgon University Library,1971,pp.71-90 रूहेला, सत्यपाल, शिक्षा का समाजशास्त्र, मूल संप्रत्यय और सिद्धान्त लखनऊ, उत्तर
प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, 1972 7 रूहेला सत्यपाल, भारतीय शिक्षा का समाजशास्त्र, जयपुर राजस्थान हिन्दी ग्रंथ
अकादमी, 1988 8 Srinivas, M.N.Social Change in Modern India.New Delhi,Ailled
Publishers.

6.6
6.7
इकाई – 6 शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन इकाई की संरचना इकाई की संरचना 6.0 उद्देश्य 6.1 प्रस्तावना 6.3 सामाजिक परिवर्तन का अर्थ 6.4 सामाजिक परिवर्तन के प्रकार अथवा रूप 6.5 सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया
सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त
शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन में संबंध 6.8 सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करने वाले तत्व 6.9 शिक्षा सामाजिक परिवर्तन के शक्तिशाली औजार के रूप में 6.10 शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का अनुसरण करती है। 6.11 सारांश 6.12 मूल्यांकन प्रश्न 6.13 संदर्भ ग्रन्थ 6.0 उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन के बाद आप – • सामाजिक परिवर्तन का अर्थ एवं प्रकार समझ सकेंगे । • सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया समझ सकेंगे ।
सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्तों की विवेचना कर सकेंगे । • सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करने वाले तत्वों का विश्लेषण कर सकेंगे । • शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन में संबंध जान सकेंगे ।
6.1 प्रस्तावना
| मानव का जीवन एवं उसकी परिस्थितियाँ सदैव एक समान नहीं रहती हैं, अपितु इसके विचार, आदर्श, मूल्य एवं भावना में किसी न किसी प्रकार का परिवर्तन असम्भावी है । जब मानव जीवन परिवर्तनशील है तो मानव इकाई से निर्मित समाज में भी परिवर्तन होना आवश्यक है ।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इसलिए परिवर्तन से कोई बच भी नहीं सकता । वैज्ञानिक आविष्कारों, नई-नई मशीनों के उपयोग, यातायात और दूरसंचार के साधनों के कारण प्राचीन एवं मध्यकालीन समाज की अपेक्षा आधुनिक समाज में प्रतिदिन क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे है । इन परिवर्तनों को ही सामाजिक परिवर्तन की संज्ञा दी जा सकती है । आजकल संपूर्ण विश्व में सामाजिक परिवर्तन तीव्रगति से हो रहा है । ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगरीय क्षेत्रों में,
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अविकसित समाज की अपेक्षा विकसित समाज में तथा दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उतरी गोलार्द्ध में सामाजिक परिवर्तन अधिक विविधता एवं तीव्रता से हो रहे हैं ।।
| मानव समाज में होने वाले अनवरत परिवर्तनों से यह धारणा परिपक्व हो चुकी है कि भौतिक जगत की भांती मानव जगत की प्रकृति भी परिवर्तनशील है । यदि देखा जाये तो हमारा वर्तमान सम्पूर्ण जीवन प्रत्येक स्तर पर उससे भिन्न है । जो कभी अतीत में था । समान परिवर्तित हो चुका है । और तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है । संयुक्त परिवार के स्थान पर व्यक्तिगत परिवार का महत्व बढ़ने लगा ।। 6.3 सामाजिक परिवर्तन का अर्थ 1. व्युत्पत्तिमूलक अर्थ : ‘सोशल’ शब्द का अर्थ सामाजिक और परिवर्तन’ शब्द का अर्थ
बदलाव अथवा विविधता है । अत: सामाजिक परिवर्तन का अर्थ समाज में बदलाव या विविधता अर्थात् सामाजिक प्रक्रिया, सामाजिक ढांचे और सामाजिक सम्बन्धों में बदलाव
है ।। विशेषज्ञों के विचार • डेविस (Davis) के अनुसार, ‘सामाजिक परिवर्तन से अभिप्राय सामाजिक संगठनों में
होने वाले बदलाव से है जोकि समाज के ढांचे एवं कार्यों में होता है । ” कुप्पास्वामी (Kuppaswamy) के शब्दों में, ‘जब हम सामाजिक परिवर्तन के बारे में बात करते है, हम साधारण रूप से यह मानते है कि सामाजिक ढांचे में एवं सामाजिक व्यवहारों में कोई परिवर्तन हुआ है ।

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