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‘शिक्षा का समाजशास्त्र शिक्षा और समाज के बीच के संबंध से सरोकार रखता है । ” विस्तृत रूप से कहें तो शिक्षा समाजशास्त्र की रुचि संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में शिक्षा व्यवस्था के अध्ययन में है ।’ इन परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा समाजशास्त्र की निम्नांकित प्रकृति है –
1 यह एक सामाजिक विज्ञान है, यह समाजशास्त्र की ही एक शाखा है । 2 यह वस्तुनिष्ठ तथा सैद्धान्तिक विषय है । यह प्रतिकारात्मक विज्ञान नहीं है ।। 3 यह ‘ ‘पॉजीटिविज्म ‘ के दर्शन से प्रभावित है । क्योंकि यह कारण-परिणाम के
संबंध, परोक्षता तथा वस्तुनिष्ठता पर आधारित है ।
4 यह समाज और शिक्षा के परस्पर संबंध का वैज्ञानिक अध्ययन करता है । 2.6 शिक्षा समाजशास्त्र और अध्ययन क्षेत्र
रोसेक – ‘ ‘शैक्षिक समाजशास्त्र के क्षेत्र में सब सामाजिक प्रक्रियाएं आ जाती है ।’
ब्राउन – ‘ ‘शैक्षिक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र के सिद्धान्तों को शिक्षा की सम्पूर्ण प्रक्रिया पर लागू करता है।
अत: शैक्षिक समाजशास्त्र का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत है । इसके अन्तर्गत जिन विषयों का अध्ययन किया जाता है, उनमें से अधिक महत्वपूर्ण निम्नांकित हैं ।
1 समाज में शिक्षक का स्थान और महत्व । 2 व्यक्ति और विद्यालय पर समाज का प्रभाव । 3 व्यक्ति और उसके सांस्कृतिक वातावरण की अन्तःक्रिया । 4 समाज की मांगें आवश्यकताएं और परिस्थितियां ।। 5 विद्यालय और सामाजिक जीवन द्वारा जनतांत्रिक भावनाओं का विकास । 6 समाज के जीवन में प्रेस, रेडियो, फिल्म, क्लब, परिवार, पुस्तकालय आदि का स्थान ।। 7 सामाजिक प्रगति, सामाजिक प्रक्रिया, सामाजिक संगठन, सामाजिक नियंत्रण और
सामाजिक परिवर्तन ।। 8 विद्यालय और समाज का अन्य संस्थाओं से पारस्परिक संबंध ।। 9 व्यक्ति और समाज की प्रगति के लिए पाठ्यक्रम में वांछनीय परिवर्तन ।। 10 शिक्षक और छात्र के पारस्परिक सम्बन्ध और उनको प्रभावित करने वाली सामाजिक
भावनाएं |
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शिक्षा समाजशास्त्र का क्षेत्र बहुत विस्तृत है । शिक्षा पर समाज की संरचना, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं और परिस्थितियों पर परिवर्तनों का जो कुछ प्रभाव पड़ता है तथा शिक्षा का समाज पर जो कुछ भी प्रभाव दिखलाई देता है – भूतकाल में, वर्तमान काल में और
आगे वाले भविष्य काल में – ये सभी पक्ष शिक्षा समाजशास्त्र विषय के क्षेत्र का निर्धारण करते हैं – करते रहेंगे ।
भूत काल
सामाजिक व्यवस्था
वर्तमान काल
समाज
शिक्षा
भविष्य काल
सामाजिक परिवर्तन
शिक्षा समाजशास्त्र के क्षेत्र सिफ्ट (Swift) ने अपनी छोटी सी सुंदर पुस्तक “A Sociology of Education” में यह रेखाचित्र प्रस्तुत किया है । Teacher
Child
School
Community (Family)
Soul Group religion etc. जैसे जैसे समाज में नए-नए परिवर्तन, आविष्कार, खोज जन व्यवहार के रूप में, जनरीतिया मूल्य, व्यवस्थायें, जनसंचार के साधनों आदि का प्रसार होता जाएगा, वैसे-वैसे ही शिक्षा, समाजशास्त्र को शिक्षा और समाज के परस्पर संबंध के अनेकानेक नए-नए पहलुओं का अध्ययन करना आवश्यक होता जाएगा । इस प्रकार शिक्षा का समाजशास्त्र एक नूतन-नवीन, सदैव हरा रहने वाला, गतिशील और प्रभावपूर्ण सामाजिक विज्ञान के रूप में रहेगा । जहां आरम्भिक शिक्षा समाजशास्त्र नस्ल, जाति, गरीबी सामाजिक विवरण के कारकों का शिक्षा पर प्रभाव देखते थे और आजकल सामाजिक परिवर्तन, जनसंचार के साधनों आदि का शिक्षा पर प्रभाव शिक्षा समाजशास्त्रियों की रुचि का विषय है, अगामी भविष्य में सामाजिक विघटन, सांस्कृतिक झटके तथा नए-नए तकनीकी सांस्कृतिक प्रतिभा और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क और अप्रत्याशित घटनाओं का औपचारिक, अनौपचारिक तथा घनिष्ठ रूप से व्यक्तिगत शिक्षा के साथ के संबंध भविष्य के शिक्षा समाजशास्त्र का क्षेत्र बनेंगे ।। 2.7 शिक्षा समाजशास्त्र की अध्ययन विधियाँ
शिक्षा समाजशास्त्र में शोध करने की है वे ही अध्ययन विधियां है जो समाजशास्त्र की हैं | यथाः
1 ऐतिहासिक विधि

2
2 तुलनात्मक विधि 3 संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक विधि 4 सामाजिक सर्वेक्षण विधि 5 सांख्यिकी विधि। 6 आदर्श-प्रकार विश्लेषण विधि
ऐतिहासिक विधि परंपरागत ऐतिहासिक विधि में महापुरुषों और महान् घटनाओं का ही अध्ययन करने का प्रचलन था । आधुनिक ऐतिहासिक विधि में जनसाधारण की अवस्था, समस्याओं, महत्वाकांक्षाओं तथा घटनाओं का अध्ययन की परंपरा चल पड़ी है | इस ऐतिहासिक विधि पर मार्क्सवादी विचारधारा का बहुत प्रभाव पड़ा है । किसी भी समस्या के अध्ययन करने में ऐतिहासिक विधि का उपयोग उस समस्या की पृष्ठभूमि को जानने के लिए करना उपयुक्त रहता है ।। तुलनात्मक विधि आमतौर से यह देखने में आता है कि दो या अधिक घटनाओं, व्यवस्थाओं, समस्याओं, परिस्थितियों या व्यक्तियों के मध्य पायी जाने वाली समानताओं और असमानताओं को उल्लिखित करना ही तुलनात्मक विधि का प्रयोग माना जाता है जैसा कि विज्ञानों, सामाजिक विज्ञान तथा मानवीकी में प्रायः होता है । लेकिन फ्रेंच समाजशास्त्री दुर्णीम के अनुसार यदि तुलनात्मक विधि का उपयोग में लाते समय शोधकर्ता किसी उपकल्पना को सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते तो तुलनात्मक विधि का प्रयोग करना निरर्थक, फलहीन या बांझस्वरूप हो जाता है । संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक विधि यह आधुनिक समाजशास्त्रियों जैसे टालकोट, पारसंस तथा रोबर्ट मर्टन ने इस विधि को प्रस्तुत किया है । इसका प्रयोग करते समय हम ऐसा करते हैंसर्वप्रथम, समाज की संरचना में कर्ता विशेष की स्थिति को विश्लेषित करते हैं । अर्थात् वह व्यक्ति जिसके किसी कार्य या व्यवहार का हम शोध अध्ययन करना चाहते है, वह समाज की संरचना में कहा पर स्थित है – किस जाति, धर्म, वर्ग, समूह, आयुवर्ग, राजनैतिक संगठन आदि से संबंधित हैं, उसकी खोज करनी होगी । यह भी देखना होता है कि औपचारिक या प्रगट सामाजिक संरचना और अनौपचारिक या अप्रगट में क्या-क्या फर्क है । उदाहरणार्थ, कक्षा शिक्षक द्वारा औपचारिक रूप से नियुक्त किया गया कक्षा का नायक (मोनिटर) एक छात्र या छात्रा होती है लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि वह कक्षा के छात्रों या छात्राओं का अनौपचारिक रूप से लोकप्रिय या चहेता नायक भी हो । यही कारण है शिक्षक द्वारा नियुक्त किया गया मोनिटर प्रायः कक्षा के विद्यार्थियों को नियंत्रित नहीं कर पाता और उनका स्वस्थ नेतृत्व नहीं कर पाता । संरचनात्मक विश्लेषण के पश्चात् हमें कर्ता विशेष या संस्था या स्थिति के प्रकार्यों का विश्लेषण करने की ओर आगे बढ़ना होता है । तीन प्रकार के प्रकार्य होते हैं: (1) प्रकार्य

वे स्थितियां या बातें जो एक समाज में सामंजस्य स्थापित करने के परिणाम को लाने में सहायक होती है । उन्हें समाजशास्त्र की भाषा में प्रकार्य कहा जाता है ।। “Function are those observed consequences which make for the education or adjustment in a given society. “Merton उदाहरण, एक कक्षा में शिक्षण शांतिपूर्वक व प्रभावपूर्ण ढंग से होता रहे, इसके लिए आवश्यक शर्ते या परिस्थितियां हैं – शिक्षक का अपने विषय में योग्य होना, उनको शिक्षण करने का ढंग आये, वह अनुशासन रखना जानता हो,

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