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साररूप में हम यह कह सकते है कि सामाजिक आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तन करने के लिए शिक्षा एक शक्तिशाली साधन है | बर्नार्ड शा ने कहा है कि शिक्षा एक विशिष्ट प्रकार के व्यक्तियों का निर्माण करती है । शिक्षा समाज को परितर्वन के लिये दिशा दे सकती है । परिवर्तनशील समाज के नवीन आदर्शों व मूल्यों को स्थापित करने के लिये शिक्षा की आवश्यकता प्रमुख है । शिक्षा उन जातीय उपलब्धियों का संरक्षण करती है हस्तान्तरण करती है। और सम्बद्धन करती जो उपलब्धियों एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त होती है । 6.12 मूल्यांकन प्रश्न
1. सामाजिक परिवर्तन का अर्थ समझाते हुए विभिन्न परिभाषायें लिखिये? 2. सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न प्रकार कौनसे है? 3. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया समझाइये? 4. सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्तों का विश्लेषण कीजिए ‘ 5. शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन में क्या सम्बन्ध है? 6. शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का शक्तिशाली औजार क्यों कहा जाता है?
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6.13 संदर्भ ग्रन्थ 1. उपाध्याय प्रतिभा (2003) “भारतीय शिक्षा में उदीयमान प्रवृत्तियाँ, शारदा पुस्तक
भवन, इलाहाबाद 2. सरयू प्रसाद (2002) “शिक्षा के दार्शनिक, ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय आधार”
इन्टरनेशनल पब्लिशिंग हाउस, मेरठ ।
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7.3
शिक्षा,
इकाई 7
शिक्षा और मानव अधिकार इकाई की रूपरेखा 7.0 उद्देश्य 7.1 मानव अधिकार विषय व शब्द की उत्पत्ति 7.2 मानव अधिकारों का जीवन में महत्व
शिक्षा एवं मानव अधिकार 7.4 मानव अधिकार – शिक्षण में उद्देश्य एवं आवश्यकता 7.5 शिक्षा सम्बन्धी प्रावधान व मानव अधिकार 7.6 सारांश 7.7 संदर्भ ग्रन्थ 7.0 उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन उपरान्त आप इस योग्य होने चाहिये कि – • मानव अधिकार विषय के प्रादुर्भाव, उत्पत्ति के बारे में बता सकेंगे । • मानव जीवन के सर्वागीण विकास हेतु घोषणा पत्र में दिये गये विभिन्न अधिकारों के
अर्थ, महत्व व अन्तर को समझ सकेंगे । | शिक्षा व मानव अधिकार के सम्प्रत्यय को समझ कर उसकी व्यवस्था कर सकेंगे ।
शिक्षा के संदर्भ में मानव अधिकारों की उपयोगिता व प्रासंगिकता को समझ सकेंगे । • भारतीय संविधान के अन्तर्गत शिक्षा में मानव अधिकार सम्बन्धी प्रावधानों को जान
सकेंगे । 7.1 मानव अधिकार – विषय व शब्द की उत्पत्ति 7.1 मानव अधिकार – विषय व शब्द की उत्पत्ति
मानव अधिकार शब्द की उत्पत्ति वितीय विश्व युद्ध के समय हुई थी । मानव अधिकार को प्राकृतिक अधिकार या मनुष्य के अधिकारों की संज्ञा भी दी जाती है | मानव अधिकारों से आशय उन मनुष्यों को दिये जाने वाले उन अधिकारों से है जो कि उसे मानव होने के नाते प्राप्त होते हैं ।
ऑक्सफोर्ड शब्दकोष के अनुसार – ‘ ‘मानव अधिकार सभी व्यक्तियों को बोलने, विचार करने व भ्रमण करने की स्वतन्त्रता से है । शिक्षा के संदर्भ में मानव अधिकार से आशय शिक्षा के द्वारा सभी के लिये खुले होने से है जिसमें जाति, भाषा, लिंग, धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो व प्राथमिक शिक्षा सभी के लिये निःशुल्क व अनिवार्य हो । विश्व में शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त साधन माना जाता है । सामाजिक परिवर्तन की श्रृंखला में विश्व के प्रत्येक विकसित एवं विकासशील राष्ट्र ने बुनियादी शिक्षा को एक आवश्यकता व अनिवार्यता के रूप में स्वीकार किया है । इसी कारण शिक्षा की सम्पूर्ण प्रणाली राज्य के वित्त

पोषण एवं नियन्त्रण में रही है । इस विचारधारा में भी तीव्र गति से परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहा है जिससे शिक्षा का निजीकरण एवं महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में दिखाई दे रहे हैं ।
| शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु सरकारी प्रयासों के साथ ही साथ निजी क्षेत्र में भी प्रयास तीव्र गति से चलाये जाते हैं जिनका मूल उद्देश्य शिक्षित समाज का निर्माण करना है ।
अधिकार शब्द का प्रादुर्भाव सर्वप्रथम यूरोप में 12वीं शताब्दी में हुआ। 14वीं शताब्दी के अन्त तक प्राकृतिक अधिकार पूर्ण रूप से विकसित हो चुका था । प्राकृतिक अधिकारों से कई नई विचारधाराऐ प्रसफुटित हुई जिससे सर्वप्रथम (1588- 1679) थॉमस हॉक की व दूसरी विचारधारा (1632- 1704 ) जॉन लॉक के विचारों से उत्पन्न हुई । व्यक्तियों को पूर्व राजनैतिक व्यवस्था में असीमित अधिकार हॉम्स ने प्रदान किये थे | हॉब्स के विचारों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि यह सिद्धान्त निरपेक्ष सरकारी सत्ता के अनुरूप है । जॉन ब्लोक ने सरकार की निरपेक्ष सरकारी सत्ता को नियन्त्रित करने का प्रयास करते हुये अपने विचार व्यक्त किये । लॉक के अनुसार जब सभ्य समाज की रचना होगी तो अत्याज्य मानव अधिकार जन सामान्य के पास रहेंगे जिससे सरकार कभी भी निरपेक्ष सत्ता प्राप्त नहीं कर सकेगी ।
लॉक के इस सिद्धान्त के परिणामस्वरूप मनुष्यों ने समता के अधिकार का उपयोग किया एवं व्यक्तियों के द्वारा प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षा व अनुकरण ने सरकार की निरंकुश सत्ता को सीमित व नियन्त्रित किया । लॉक ने अपने सिद्धान्त में मनुष्यों को यह भी अधिकार दिया कि कोई भी सरकार यदि अपने नागरिकों के हितों व अधिकारों का उल्लंघन करती है तो ऐसी सरकार को विधिपूर्वक हटाया जा सकता है ।। मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा –
वर्तमान समय में शान्ति, न्याय, स्वतन्त्रता कायम रखने के लिये मानव की जन्मजात गरिमा, सम्मान व प्राकृतिक अधिकारों की स्वीकृति दिया जाना अनिवार्य शर्त है ।
| इतिहास साक्षी है कि जब-जब मानव अधिकारों के प्रति उपेक्षा या अवहेलना हुई तबतब मनुष्य का बर्बरतापूर्ण व्यवहार स्पष्ट दृष्टिगत हुआ है । इन सभी बुराईयों से बचने के लिये एक ऐसे विश्व की स्थापना का संकल्प लिया गया जिसमें लोगों को भाषण और विश्वास की स्वतन्त्रता और भय व अभाव से मुक्ति मिलेगी । कानून के शासन के अन्तर्गत एक भयमुक्त निर्भीक समाज का निर्माण करने के लिये मानव अधिकारों की रक्षा किया जाना आवश्यक है । मानवाधिकार की सार्वभौम घोषणा निम्न प्रकार की गई है :
अनुच्छेद : 1 – सभी मानव प्राणी गरिमा व अधिकारों की दृष्टि से स्वतन्त्र व समाज जन्में है, उन्हे बुद्धि व अन्तरात्मा की देन प्राप्त है । उन्हें परस्पर भाईचारे के भाव से कार्य करना चाहिये ।
अनुच्छेद : 2 – सभी को इस घोषणा में निहित सभी अधिकारों और स्वतन्त्रताओं को प्राप्त करने का हक है और इस मामले में जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीति या अन्य विचार प्रणाली किसी देश या समाज विशेष में जन्म, सम्पत्ति या अन्य प्रकार की मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जायेगा ।
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अनुच्छेद : 3 – प्रत्येक को ‘ ‘जीवन, स्वाधीनता और वैयक्तिक सुरक्षा ‘ का अधिकार
अनुच्छेद : 4 – किसी भी मानव को दासता या सेवमत्व ए(सअमतल)ए में नहीं रखा जायेगा । दासता और दास व्यापार अपने सभी रूपों में निषिद्ध होगा ।

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