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प्रकार की शिक्षा का प्रारंभ प्रत्येक व्यक्ति के लिए उस समय होता है जब वह विद्यालय जाना प्रारंभ करता है तथा विद्यालय समाप्ति पर शिक्षा समाप्त हो जाती है । संकुचित अर्थ में शिक्षा औपचारिक शिक्षा साधनों द्वारा निर्धारित की जाने वाली एक प्रक्रिया है।
जिसमें शिक्षा का स्थान, शिक्षा देने वाले व्यक्ति, शिक्षा ग्रहण करने वाले व्यक्ति, समय, पाठ्यक्रम पूर्व निर्धारित होते है । संकुचित अर्थ में हम शिक्षा को पुस्तकीय या सैद्वान्तिक प्रक्रिया मानकर चलते है । प्रोफेसर ड्रीवर (Prof. Dumville) के अनुसार:
| “शिक्षा एक प्रक्रिया है, जिसमे तथा जिसके द्वारा बालक के शान, चरित्र तथा व्यवहार को एक विशेष सॉचे में ढाला जाता है ।
” Education is a process in which and by which the knowledge, Character and behavior of the young are shaped and moulded’ एस.एस. मैकेन्जी (S.S Mackenge) के अनुसार :
“संकुचित अर्थ में किसी भी ऐसे सचेतन प्रयास को शिक्षा कहा जा सकता है जो हमारी क्षमताओं का विकास एवं वृद्धि करें ।”
“An narrower sense Education may be taken to mean any consciously directed effort to development cultivate our powers.”
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9.3.5 शिक्षा की प्रकृति
| वैज्ञानिक प्रवृति ने शिक्षा की प्रकृति में बदलाव प्रस्तुत किया है । इस बदलाव के फलस्वरूप शिक्षा को एक विज्ञान के रूप में देखा जाने लगा है । परन्तु इस विज्ञान का स्वरूप समाजिक है । साथ ही वह नियामक या प्रमाणिक भी है । इस प्रवृति के फलस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक मूल्यांकन, शैक्षिक अनुसंधान तथा शैक्षिक तकनीकी आदि को स्थान मिला । शिक्षा को पूर्णत: न तो सैद्वान्तिक कहा जा सकता है और न पूर्णत: व्यावहारिक ।
शिक्षा की प्रक्रिया का यदि हम विश्लेषण करे तो यह कह सकते है कि इसमें विज्ञान तथा कला दोनों की ही विशेषताएँ विद्यमान है । शिक्षा के कुछ नियम ऐसे है जो सर्वमान्य तथा सुनिश्चित है तो कुछ परिवर्तनशील है । इसी कारण शिक्षा को न तो विशुद्ध रूप से विज्ञान की श्रेणी में रखा जा सकता है और न ही पूर्णतयता कला की श्रेणी में वरन् यह दोनो का सम्मिश्रण है ।।
| शिक्षा का कला पक्ष शिक्षण की वह प्रक्रिया है जिसमें अध्यापक बालक को प्रभावित करने का प्रयत्न करता है तथा बालक के मस्तिष्क रूपी पट पर शिक्षक अपनी कला अंकित करता है । वह अपने ढंग से शिक्षण करने के लिए स्वतंत्र होता है । शिक्षा का विज्ञान पक्ष शिक्षण की वह प्रक्रिया है जिसमे यह माना गया है कि बालक एक जीवित प्राणी है । उसकी अपनी प्रवृतियां तथा रूचियाँ होती है, उसके मस्तिष्क की तुलना पूर्णतया स्वच्छ पट में नही की जा सकती ।।
शिक्षा मनुष्य की जन्मजात दैनिक शक्तियों एवं इसमें तथा कौशल में वृद्धि द्वारा व्यवहार परिवर्तन करने वाली सामाजिक प्रक्रिया है । शिक्षा प्रक्रिया मनुष्य के विकास में सहायक होती है ।
1 शिक्षा एक सतत प्रक्रिया के रूप में 2 शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में 3 शिक्षा एक दविध्रुवीय प्रक्रिया है ।।
4 शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है ।। स्वमूल्यांकन प्रश्न ।
1. भारतीय मत के अनुसार शिक्षा के सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए । 2. शिक्षा की अवधारणा स्पष्ट कीजिए ।
3. “शिक्षा विज्ञान भी है और कला भी’ ‘ इस कथन की पुष्टि कीजिए । 9.4 शिक्षा के कार्य
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से शिक्षा के रूप को इस प्रकार बदलने का प्रयास किया जा रहा है जिससे वह मानव और राष्ट्र दोनों का हित करे । मानव जीवन में शिक्षा के कार्य देश, समय और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार सदैव भिन्न रहे है और आज भी परिवर्तनशील है । राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा के कार्य-राष्ट्र को भावनात्मक रूप से एक सूत्र में पिरोते है । 9.4.1 मानव जीवन में शिक्षा के कार्य ।
मानव जीवन में शिक्षा के प्रमुख कार्य इस प्रकार है :
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1 आवश्यकताओं की पूर्ति ।। 2 आत्म निर्भरता की प्राप्ति । 3 व्यावसायिक कुशलता की प्राप्ति । 4 भौतिक सम्पन्नता की प्राप्ति । 5 अच्छे नागरिकों का निर्माण । 6 व्यक्तित्व का विकास । 7 चरित्र का विकास ।। 8 अनुभवों का पुनर्गठन ।। 9 वातावरण से अनुकूलन ।। 10 वातावरण का रूप-परिवर्तन । 11 मूल्यों का विकास ।। 12 व्यक्तित्व का सर्वागीण विकास 13 सामाजिक भावना का विकास 14 भावी जीवन की तैयारी 15 अनुभवों का पुनर्गठन एवं पुनर्रचना
| जीवधारी होने के कारण भोजन, मकान और वस्त्र व्यक्ति की जैविक आवश्यकताएँ है । व्यक्ति की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करना, शिक्षा का आवश्यक कार्य है । मानव जीवन में शिक्षा के इस कार्य का महत्व बताते हुए स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है- ‘ ‘शिक्षा का कार्य यह पता लगाना है कि जीवन की समस्याओं को किस प्रकार हल किया जाये और आधुनिक सभ्य समाज का गंभीर ध्यान इसी बात में लगा हुआ है । “
| आत्म निर्भर व्यक्ति जीवन में उन्नति करता है साथ ही अपने कार्यों को सफलतापूर्वक करने के कारण वह समाज की उन्नति में भी योगदान देता है । व्यावसायिक कुशलता की प्राप्ति रो छात्र, देश के उत्पादन में वृद्धि करेंगे तथा उनकी जीविका की समस्या हल हो जायेगी
शिक्षा छात्रों में स्पष्ट विचार, अनुशासन, सहनशीलता, सहयोग, देश-प्रेम आदि गुणों का विकास करे, तभी शिक्षा छात्रों को उत्तम नागरिक बनाकर प्रजातंत्र को सफल बना सकेगी । शिक्षा का कार्य छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है । शिक्षा जीवन की तैयारी करना है, अनुभवों का पुनर्गठन करना है, तथा मूल्यों का विकास करना है अर्थात् मानव जीवन में शिक्षा का कार्य समाज के सदस्यों की उन सब शक्तियों, क्षमताओं और गुणों का विकास करना है, जो उसमें विद्यमान है, तथा जिससे वे निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ सके । 9.4.2 राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा के कार्य
राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा के प्रमुख कार्य इस प्रकार है :1. नेतृत्व के लिए प्रशिक्षण ।। 2. कुशल कार्यकर्ताओं की पूर्ति ।। 3. व्यक्तित्व हित की सार्वजनिक हित से निम्नता । 4. सामाजिक कर्तव्यों की भावना का समावेश ।
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5. राष्ट्रीय विकास । 6. राष्ट्रीय एकता । 7. भावनात्मक एकता । 8. मानव-प्रकृति व चरित्र । 9. राष्ट्रीय अनुशासन । 10. धर्म-निरपेक्षता ।।
राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का मुख्य कार्य व्यक्तियों को इस प्रकार प्रशिक्षित करना है कि वे सामाजिक, राजनैतिक, औद्योगिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में नेतृत्व का कार्य कर सके । व्यक्ति को इस प्रकार का प्रशिक्षण देना कि वह अपनी स्वयं की इच्छा से अनुशासन में रहे। और हर प्रकार का बलिदान करने को तैयार रहे तभी वह सार्वजनिक हित में योग देकर देश का कल्याण कर सकेगा ।

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