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जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं तथा वातावरण के साथ त्रुटिपूर्ण या विरोधाभासी सामंजस्य करे तो उसे कुसमायोजन प्रतिक्रियाएँ कहते हैं । ये असामान्य व्यवहारों को जन्म देती है ।। स्वमूल्यांकन प्रश्न 1 समायोजन क्या है | स्पष्ट कीजिए । 2 समायोजन के प्रमुख लक्षण क्या है? 3 समायोजित व्यक्ति की विशेषताऐ बताइये । 4 समायोजन के प्रकार क्या क्या है? 5 समायोजन के प्रमुख सोपान कौन-कौन से है? 17.8 समायोजन यंत्र
यदि हम समायोजन प्रक्रिया पर नजर डालें तो पता चलता है कि व्यक्ति अपने उद्देश्यों को परिवर्तित करके बाधाओं को दूर करके समायोजन करता है । परन्तु जीवन में कभी-कभी समायोजित होने के लिये उसे द्वन्द्व, कुंठा व संघर्ष से बचने या अपनी रक्षा करने के लिये प्रयास करना पड़ता है । इसे रक्षात्मक तंत्र भी कहते हैं । “समायोजन तंत्र से तात्पर्य ऐसी विधि
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जिसमें अवरोधों को दूर करने उद्देश्यों तक पहुँचने प्रेरकों को सन्तुष्ट करने, कुंठा व भग्नाशा को दूर एवं सन्तुलन स्थापित करने से है । “व्यक्ति समायोजन तंत्र का प्रयोग अपने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु करता है । दुश्चिंता तनाव व कुंठा से रक्षा करने के साथ-साथ इससे सन्तुष्टि मिलती है।
निम्नलिखित यंत्रों का विवरण इस प्रकार है – 17.8.1 आक्रामकता
आक्रामकता एक प्रकार का समायोजन यंत्र हैं जिसमें भग्नाशा व कुण्ठा उत्पन्न करने वाली स्थिति क्षति पहुँचाने का प्रयास किया जाता है कभी-कभी व्यक्ति किसी बाह्य वस्तु के प्रति क्रोध का प्रदर्शन करता है । किसी को पीटना, अपशब्द कहना, आलोचना करना आदि आक्रामकता है, व्यक्ति कभी-कभी अपने बड़ों से आक्रामकता का प्रदर्शन नहीं कर पाता तो वह ऐसी स्थिति में अपनी आक्रामकता का प्रदर्शन किसी अन्य वस्तु या जानवरों पर करता है । पत्नी पर क्रोधित होने की स्थिति में खाने की थाली दूर कर सरका देता है । भूखा रहना भी आक्रामकता है | 17.8.2 क्षतिपूर्ति
कोलमैन (1974 ) के अनुसार इस यंत्र के द्वारा अवांछनीय लक्षण को व्यक्ति वांछनीय लक्षण के बढ़े हुये रूप के द्वारा बदल लेता है । इस यंत्र के द्वारा व्यक्ति अपनी हीनता और अनुपयुक्तता के लक्षणों से अपनी सुरक्षा करता है । प्रत्येक व्यक्ति अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करता है । एक व्यक्ति एक क्षेत्र की कमी को दूसरे क्षेत्र में श्रेष्ठता प्राप्त करके सफलता प्राप्त करना चाहता है । इस प्रकार व्यक्ति अपनी हीन भावना से बच पाते हैं । जो व्यक्ति अपने शैक्षिक क्षेत्र में उच्च स्तरीय अंक नहीं प्राप्त कर पाते, वे सह-शैक्षिक गतिविधियों में श्रेष्ठता प्राप्त कर लेते हैं । एक व्यक्ति गणित विषय में कमजोर है निरन्तर अभ्यास व कोचिंग के द्वारा अपनी दुर्बलताओं को दूर कर लेता है । अर्थात् जो व्यक्ति एक क्षेत्र विषय में कमजोर है तो वह दूसरे क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को दिखलाकर उस क्षति को दूर करता है । 17.8.3 उदात्रीकरण
वी.ई. फिशर ने इसको इस प्रकार समझाया है कि कार्य शक्ति की प्रवृत्तियों या प्रेरकों का नैतिक, सांस्कृतिक विषयों की ओर पुनः निर्देशन की क्रिया ही उदात्रीकरण है, इसके द्वारा व्यक्ति अपनी अनैतिक प्रेरणाओं की संतुष्टि समाज स्वीकृत उद्देश्यों के अनुसार करता है । कालमैन (1974) के अनुसार इसके द्वारा कुण्ठित लैंगिक शक्ति (Frustrated Sexual Energy) वह साधन है जिससे यह शक्ति आंशिक रूप से Substitutive क्रियाओं में परिवर्तित हो जाती है यह एक प्रकार का Redirection है । इस यंत्र से सम्बन्धित व्यवहार समाज की दृष्टि से मान्य ही नहीं होता बल्कि इस प्रकार के व्यवहार का समाज में एक निश्चित मूल्य भी होता है । उदाहरण के लिये प्रेम की बाजी हारकर न जाने कितने लोग साहित्य सेवा में जुट जाते हैं और बड़े महान साहित्यकार कवि या संगीतकार बन जाते हैं । श्री तुलसीदास, बैजू बावरा आदि इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं ।
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| इस यंत्र में दमित इच्छाएँ वांछनीय रास्तों की ओर प्रवृत्त हो जाती हैं जिसमें व्यक्ति की विभिन्न ग्रन्थियों व निराशाओं का शोधन हो जाता हैं । व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिये यह महत्वपूर्ण रक्षा युक्ति है । उदात्रीकरण की व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है। अध्ययनशील, शोध की योग्यता, जिज्ञासा, साहित्यिक व ललित कलाओं में रुचि जैसे गुणों का विकास होना, उदात्रीकरण के फलस्वरूप होता है । इस युक्ति में इड, अहं व परमअहं तीनों एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। 17.8.4 प्रक्षेपण
| अपनी भावनाओं और लक्षणों को दूसरों में देखना या दूसरों पर आरोपित करना ही प्रक्षेपण है, यह वह यंत्र है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी कठिनाइयों का दोषारोपण दूसरों पर करता है – इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं – (1) टेनिस के खेल में हारने वाला खिलाड़ी कहे कि गेंद अच्छी नहीं थी, (2) फेल होने पर विद्यार्थी कहे कि परीक्षा पत्र खराब था, (3) भ्रष्टाचारी व्यक्ति अक्सर कहते सुने जाते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, आदर्शों धार्मिक मर्यादाओं और नैतिक मर्यादाओं का निरादर हो रहा है । अर्थात् जो व्यक्ति जैसा होता है वह अपनी भावनाओं को दूसरों पर आरोपित करता है। 17.8.5 औचित्य स्थापना या युक्तिकरण
इस युक्ति में व्यक्ति अपनी असफलताओं व निराशाओं को तार्किक आधार पर अभिव्यक्ति देकर अपने अहं की तथा सामाजिक प्रतिष्ठा की रक्षा करता है, जब व्यक्ति किसी कार्य में असफल हो जाता है तो असफलता के पीछे कई कारणों को ढूंढकर औचित्यीकरण करता है – उदाहरण के लिये, अगर खड़े हैं, नाच न जाने आंगन टेड़ा तथा यदि परीक्षा में असफल हो जाता है तो अध्यापक को दोषी मानकर अपनी स्थिति को सिद्ध करने का प्रयास करता है । 17.8.6 दमन
इस युक्ति का प्रयोग सिम्मण्ड फ्रायड ने किया व्यक्ति इच्छा शक्ति को दबा देता क्योंकि वह असामाजिक रूप किये हुये होती है । हम दुखदायी घटनाओं को भूल जाते हैं अथवा उन स्थानों पर नहीं जाना चाहते जो हमारे कष्टदायी अनुभवों से सम्बन्धित होते हैं । व्यक्ति उसके अचेतन मन को अवांछनीय लगने वाले तथा उनमें आदर्शों का विरोध करने वाले विचारो व इच्छाओं को अचेतन मन में ढकेल देता है जहाँ वे क्रियाशील रहते हुये उसके व्यक्तित्व को अस्वीकार ही नहीं करता अपितु उनकी सत्ता से भी इन्कार कर उन्हें अचेतन स्तर पर नहीं आने देता । दुःख एवं अवांछनीय इच्छाओं और अनुभवों को भूलना ही अच्छा है ।। 17.8.7 दिवा स्वप्न
दिवा स्वप्न को तरंगमयी कल्पना (Fantasy) भी कहा जाता है | दिवास्वप्नों को हवाई किले बनाना (Building Castles in the air) भी कहा जा सकता है । यह देखा गया है कि जब बालक तनाव, अन्तद्वन्द्व और कुण्ठा की स्थिति में होता है तो वह दिवास्वप्नों के सहारे अपना सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है । दिवास्वप्नों में उसका मनोराज्य होने के कारण घटनाएँ उसके अनुसार घटती हैं और इस प्रकार थोड़ी देर के लिये अपनी निराशा को आशा में बदल देता है और थोड़ी देर के लिये सुनहरे स्वप्नों को वास्तविक जीवन का अंग
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